जयपुर। पिछले दिनों सांगानेर निवासी सुरेन्द्र शर्मा पंचतत्व में विलीन हो गए। उनके जाने का दुःख शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। लेकिन इस दुःख की घड़ी में एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जो समाज में बदलती सोच की एक खूबसूरत मिसाल है। शर्मा विद्युत विद्युत विभाग में AEN की पोस्ट पर थे।
18 अगस्त को पगड़ी रस्म में उनकी बड़ी पुत्री तनिष्का शर्मा को पगड़ी पहनाई गई। जिस समाज में आज भी यह कहा जाता है कि “बेटा होना चाहिए, बेटा ही पिता का सहारा होता है,” वहाँ तनिष्का ने साबित कर दिया कि जिम्मेदारी निभाने के लिए बेटा होना जरूरी नहीं है।

स्व सुरेन्द शर्मा की अंतिम यात्रा से लेकर मुखाग्नि देने तक, और इन बारह दिनों में होने वाली हर रस्म और जिम्मेदारी को तनिष्का ने जिस साहस और आत्मविश्वास के साथ निभाया, वह सच में गर्व की बात है।
बेटी ने पिता को अंतिम विदाई दी, उनके संस्कारों को आगे बढ़ाया और हर उस जिम्मेदारी को निभाया, जिसे कभी केवल बेटों का अधिकार और कर्तव्य माना जाता था
समाज बदल रहा है। सोच बदल रही है।
अब बेटा-बेटी में फर्क करने की जरूरत नहीं।
बेटा हो या बेटी—संतान वही है जो अपने माता-पिता के सुख-दुःख में उनके साथ खड़ी रहे। सुरेन्द्र शर्मा के दो बेटियां है। बड़ी बेटी तनिष्का ओर छोटी बेटी अनुष्का।


