जयपुर। जयपुर के किसी स्कूल में 11वीं का एक बच्चा स्ट्रीम चुनने वाला फॉर्म भर रहा है — साइंस, साथ में कंप्यूटर साइंस। पूछो क्यों, तो जवाब आत्मविश्वास से आता है: “सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना है।” अब पूछो कि सॉफ्टवेयर इंजीनियर रोज़ असल में करता क्या है, या जब यह बच्चा ग्रेजुएट होगा तब यह काम कैसा दिखेगा — तो जवाब उतना पक्का नहीं रहता। ज़्यादातर सब्जेक्ट सिर्फ इसलिए चुना जाता है क्योंकि वो आज “सेफ” और पॉपुलर लगता है।
यह सीन जयपुर और राजस्थान के हज़ारों घरों में हर साल दोहराता है। कोर्स अक्सर उसकी आज की छवि देखकर चुना जाता है — यह सवाल पूछे बिना कि जब बच्चा असल में इस फील्ड में उतरेगा, तब यह फील्ड कैसी होगी।
असली समस्या
राजस्थान में ज़्यादातर करियर फैसले आज भी एक पुरानी सोच पर टिके हैं — इंजीनियरिंग स्टेबल, मेडिकल इज़्ज़तदार, सरकारी नौकरी सिक्योर। यह सोच गलत नहीं, पर इन रास्तों के पीछे की जॉब मार्केट अब वैसी नहीं रही।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की Future of Jobs Report 2025 — 55 देशों की 1,000 से ज़्यादा कंपनियों पर आधारित — कहती है कि 2030 तक नौकरियों में लगने वाले करीब 39% ज़रूरी स्किल्स बदल या पुराने पड़ सकते हैं। इसी दशक में दुनिया भर में करीब 17 करोड़ नई नौकरियां बन सकती हैं, जबकि करीब 9.2 करोड़ खत्म भी हो सकती हैं — यानी नौकरियां बढ़ेंगी, पर अंदर बहुत कुछ बदल रहा होगा।
भारत की स्थिति कागज़ पर अच्छी है। QS World Future Skills Index 2025 में भारत “Future of Work” की तैयारी में दुनिया में दूसरे नंबर पर है, लेकिन “Academic Readiness” में 26वें और “Skills Fit” में 37वें नंबर पर। यही असली गैप है — मौके कम नहीं, कमी है बच्चों को उन मौकों तक सोच-समझकर पहुंचाने के तरीके की।
गाइडेंस अब तक कहां पीछे है
यूनिसेफ YuWaah की Bharat Career Aspirations Report 2024 में शामिल करीब 5,000 बच्चों में से 10% से भी कम को पढ़ाई से पहले कोई करियर गाइडेंस मिली थी। 2025 के एडिशन में — राजस्थान समेत सात राज्यों के 21,000 से ज़्यादा बच्चों के साथ — ट्रेंड काउंसलर तक पहुंच अब भी कम पाई गई, खासकर बड़े प्राइवेट स्कूलों से बाहर।
IC3 इंस्टीट्यूट और FLAME यूनिवर्सिटी के 2024 सर्वे के मुताबिक भारत में करीब एक चौथाई बच्चों को कोई काउंसलिंग नहीं मिलती, और करीब 40% ने कभी किसी काउंसलर से सीधी बात नहीं की — जबकि 80% से ज़्यादा के पास पहले से AI टूल्स की पहुंच थी। जानकारी होना और सही गाइडेंस मिलना एक बात नहीं है।
[यहां एक स्थानीय आवाज़ जोड़ें — जयपुर के किसी अभिभावक, 12वीं के छात्र या स्कूल काउंसलर का 2–3 पंक्ति का कोट, जो इस दुविधा को असल ज़िंदगी से जोड़े।]
राजस्थान की कोचिंग संस्कृति और यह सवाल
राजस्थान ने कॉम्पिटिटिव एग्ज़ाम की तैयारी के लिए मज़बूत सिस्टम बनाया है — कोटा देश भर में जाना जाता है, और जयपुर खुद को “कोटा शिफ्ट हुए बिना कोचिंग” के तौर पर पेश करता है। पर एग्ज़ाम की तैयारी और करियर एक्सप्लोरेशन एक चीज़ नहीं है। कोई कोचिंग सेंटर बच्चे को NEET या JEE के लिए तैयार कर सकता है, पर यह नहीं बता सकता कि यह एग्ज़ाम उस बच्चे के लिए सही मंज़िल है या नहीं।
राजस्थान से हर साल NEET में बैठने वाले छात्रों की संख्या, राज्य में मौजूद कुल मेडिकल सीटों से कई गुना ज़्यादा है। 2025 में अकेले राजस्थान से करीब 3.33 लाख छात्रों ने NEET परीक्षा दी, जबकि राज्य में कुल मिलाकर करीब 7,330 MBBS सीटें ही उपलब्ध हैं — यानी हर सीट के लिए करीब 45 दावेदार।
असली तस्वीर इससे भी ज़्यादा चिंताजनक है। इन 7,330 सीटों में से सिर्फ करीब 4,630 सीटें ही सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हैं, जहां फीस आम परिवार की पहुंच में होती है — निजी कॉलेजों में सालाना फीस 25 से 35 लाख रुपये तक जाती है। यानी हर सरकारी सीट के लिए करीब 72 छात्र मुकाबले में हैं, और ज़्यादातर मध्यमवर्गीय परिवारों के पास असल में सिर्फ एक ही किफ़ायती रास्ता बचता है। यह आंकड़ा मांग दिखाता है, पर यह नहीं बताता कि इनमें से कितने बच्चों ने यह रास्ता सोच-समझकर चुना, और कितनों ने सिर्फ इसलिए क्योंकि सफलता की सबसे जानी-पहचानी परिभाषा यही थी।
आगे का रास्ता
इसका मतलब यह नहीं कि इंजीनियरिंग, मेडिकल, कॉमर्स या सरकारी नौकरी गलत रास्ते हैं — सही बच्चे के लिए ये आज भी भरोसेमंद रास्ते हैं। सवाल यह है कि बच्चा इस फैसले तक पहुंचा कैसे। जो फैसला बच्चे की दिलचस्पी, काबिलियत और काम करने के तरीके को असल में समझकर लिया जाता है, वो हमेशा ज़्यादा मज़बूत होता है — खासकर तब जब जॉब मार्केट लगातार बदल रही हो।
माता-पिता और बच्चे आज से ही एक छोटा बदलाव कर सकते हैं — “तुम बड़े होकर क्या बनोगे?” की जगह पूछें, “तुम्हें किस तरह की समस्याएं सुलझाना पसंद है, और किस तरह का काम का माहौल सूट करेगा?” दूसरा सवाल बातचीत खोलता है, पहला सिर्फ एक लेबल मांगता है।
तीन छोटे कदम
- इस हफ्ते: घर में जो दो-तीन करियर “फाइनल प्लान” माने जा रहे हैं, उन्हें लिख लें — सामने अलग-अलग लिखें कि असल में क्या पता है, और क्या सिर्फ माना जा रहा है।
- इस महीने: बच्चे की दिलचस्पी वाली फील्ड में काम कर रहे किसी एक इंसान से बीस मिनट की असली बातचीत कराएं — यह अक्सर महीने भर की ऑनलाइन सर्चिंग से ज़्यादा काम आती है।
- कोई बड़ा फैसला लेने से पहले — स्ट्रीम चुनना, कोई एग्ज़ाम पकड़ना, कॉलेज चुनना — एक ठहराव लें और फैसले को बच्चे की असली दिलचस्पी व काबिलियत से मिलाकर देखें, सिर्फ उसकी आज की पॉपुलैरिटी से नहीं।
करियर गाइडेंस का मकसद कभी यह नहीं था कि बच्चा जल्द से जल्द कोई भी करियर चुन ले। मकसद है कि बच्चा खुद को समझे, अपने ऑप्शन्स को समझे, और इन दोनों के बीच का रास्ता समझे — क्योंकि जिस दुनिया में यह बच्चा आगे कदम रखेगा, वो आज जैसी नहीं होगी। सबसे काम की गाइडेंस भविष्य बताने का दावा नहीं करती — वो बच्चे को इस लायक बनाती है कि भविष्य जैसा भी आए, वो उसके लिए तैयार रहे।
लेखक शिवनंदन कुमावत जयपुर स्थित करियर गाइडेंस एक्सपर्ट हैं।


