जयपुर। पांच दिनों तक चल रहे जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2025 (JLF) का सोमवार को भव्य समापन होगा। सोमवार को कार्यक्रम की शुरुआत “रघुपति राघव राजा राम” भजन के साथ हुई, जिसने पूरे माहौल को आध्यात्मिक और साहित्यिक ऊर्जा से भर दिया।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) 2025 में सोमवार को मशहूर फिल्म निर्देशक इम्तियाज अली ने शिरकत की और अपनी फिल्मों, सिनेमा के बदलते स्वरूप और अपने जीवन के अनुभवों पर खुलकर बात की। सेशन के दौरान उन्होंने अपनी फिल्म निर्माण की प्रक्रिया, बचपन के संघर्ष और सिनेमा के बदलते स्वरूप पर अपने विचार साझा किए।

सेशन की शुरुआत में जब लोगों ने उन्हें “इम्तियाज जी” कहा तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि मुझे बस इम्तियाज कहो। ‘इम्तियाज जी’ सुनकर ऐसा लगता है कि यह किसी और का नाम है। अगर किसी फिल्म मेकर की आलोचना होती है या उस पर पत्थर फेंके जाते हैं, तो वह उसी के नाम पर होना चाहिए।
इम्तियाज अली ने अपनी स्कूली शिक्षा के दिनों को याद करते हुए बताया कि 9वीं कक्षा में फेल होना उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था। उन्होंने कहा कि इस असफलता ने मुझे सिखाया कि ज़िंदगी में ठोकरें खाकर ही आगे बढ़ा जाता है। इसी के चलते मैं अपने सपनों को पूरा करने की हिम्मत जुटा पाया।
उन्होंने अपने बचपन की यादें ताज़ा करते हुए कहा कि उनके घर के पास एक थिएटर था। कई बार थिएटर का दरवाजा आधा खुला रहता था, जिससे मैं स्क्रीन का सिर्फ़ एक हिस्सा देख पाता था। कभी अमिताभ बच्चन की नाक दिखती थी, तो कभी रेखा के कान। जब मैंने फिल्म निर्देशन शुरू किया, तो यह अनुभव भी मेरे काम आया।
इम्तियाज अली ने बताया कि उनका जयपुर से पुराना जुड़ाव है। मेरे थिएटर के पास ‘जयपुर हेयर कटिंग सैलून’ था, जहां लोग मिथुन की तरह बाल कटवाते थे। मैं उन्हें देखता था और इस तरह जयपुर से मेरा कनेक्शन बना।
सिनेमा और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को लेकर उन्होंने कहा कि आज का सिनेमा दर्शकों की पसंद के हिसाब से बन रहा है। यह डेमोक्रेसी है, जैसी फिल्में लोग देखेंगे, वैसी ही फिल्में बनेंगी। वहीं, बायोपिक बनाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि अभी बायोपिक बनाने में इंटरेस्टेड नहीं हूं, लेकिन अगर कभी बनाया तो अमीर खुसरो पर बनाऊंगा।
फेस्टिवल के आखिरी दिन बॉलीवुड अभिनेता, निर्देशक, नाटककार और लेखक मानव कौल ने ‘अ बर्ड ऑन माय विंडो सिल’ सेशन में अपने जीवन से जुड़े अनोखे अनुभव साझा किए।
“मैंने चाय बेची, पतंग बेची – लेकिन सपनों का पीछा करना नहीं छोड़ा”

मानव कौल ने अपनी संघर्षभरी यात्रा के बारे में खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि मैंने कई तरह के काम किए-चाय की दुकान चलाई, पतंगें बेचीं। हो सकता है कि मैं कुछ और अच्छा कर पाऊं या नहीं, लेकिन एक चीज़ जो मैं बहुत अच्छी तरह कर सकता हूं, वो है चाय बनाना। चाय मेरी ज़िंदगी का अहम हिस्सा रही है। उनकी यह बात सुनकर श्रोताओं ने तालियों से उनका स्वागत किया।
सेशन के दौरान, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में हिंदी के प्रोफेसर ऐश्वर्या कुमार ने उनसे चर्चा की। बातचीत में मानव कौल ने अपने बचपन की यादें ताज़ा करते हुए कहा कि मैं कश्मीर के बारामूला में पैदा हुआ और मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में पला-बढ़ा। गांव और छोटे शहरों में पले-बढ़े लोगों के पास एक खास तरह की आज़ादी होती है, लेकिन साथ ही एक तरह का कॉम्प्लेक्स भी रहता है।
उन्होंने बताया कि बचपन में उन्हें दुनिया देखने की तीव्र इच्छा थी। मैं अपने दोस्त सलीम के साथ होशंगाबाद रेलवे स्टेशन जाकर घंटों ट्रेनों को आते-जाते देखा करता था। हम सोचते थे कि ये ट्रेनें आखिर कहां जाती हैं?
मानव कौल ने अपनी हाल की यूरोप यात्रा का ज़िक्र करते हुए कहा कि मैं अभी-अभी यूरोप से लौटा हूं और अब फिर से लग रहा है कि अगली यात्रा कहां की जाए। जिंदगी एक सफर है और यह सफर कभी नहीं रुकना चाहिए।
पांच दिनों तक चले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2025 में दुनियाभर से आए लेखकों, विचारकों, कलाकारों और साहित्य प्रेमियों ने हिस्सा लिया। इस बार का फेस्टिवल नई किताबों, अनूठी चर्चाओं और साहित्य की नई धाराओं को समर्पित रहा है।

अभिनेत्री हुमा कुरैशी ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2025 में अपने नए सफर का एलान करते हुए कई अहम खुलासे भी किए। इस बार वे एक लेखिका के रूप में अपनी पहचान बना रही हैं। उनका डेब्यू फैंटेसी उपन्यास ‘ज़ेबा: एन एक्सीडेंटल सुपरहीरो’ पाठकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
हुमा कुरैशी ने कहा कि लेखन की दुनिया में कदम रखना उनके लिए स्वाभाविक था। उन्होंने बताया कि अभिनय करते समय मुझे अलग-अलग किरदार निभाने का मौका मिलता था, जिससे मैं खुद को लिखने के लिए प्रेरित महसूस करती थी।
उन्होंने बताया कि वे रोज़ाना पूरा दिन नहीं लिखती थीं, बल्कि सुबह के समय ही अपनी किताब के कुछ पन्ने लिखने पर ध्यान देती थीं। हुमा ने कहा कि इस किताब के सभी पात्र कहीं न कहीं मेरे व्यक्तित्व का ही हिस्सा हैं। लेखन मेरे लिए अपने विचारों और अनुभवों को लोगों तक पहुंचाने का एक जरिया है।
हुमा कुरैशी ने अपनी किताब ‘ज़ेबा: एन एक्सीडेंटल सुपरहीरो’ के बारे में विस्तार से बताया। यह एक विद्रोही स्वभाव वाली लड़की ज़ेबा की कहानी है, जो न्यूयॉर्क के अपने आलीशान अपार्टमेंट में जीवन का आनंद ले रही होती है। लेकिन जब वह अपने चचेरे भाई की शादी में शामिल होने के लिए भारत आती है, तो उसे अपनी सुपरपावर्स का पता चलता है।
हुमा ने कहा कि हर किसी में ताकत होती है, लेकिन उसे पहचानने की क्षमता अलग-अलग होती है। मेरा यह उपन्यास हर उम्र और हर जेंडर के लिए है, जिसमें हर कोई खुद को ज़ेबा से जोड़ सकता है।
