एनएसडी की भव्य रंगमंचीय प्रस्तुति
जयपुर। पर्यटन विभाग की ओर से आयोजित राजस्थान दिवस समारोहों की सांस्कृतिक श्रृंखला में राजधानी के रंगमंच प्रेमियों के लिए एक खास नाट्य संध्या सजेगी । राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) की ओर से 17 मार्च को पौराणिक महागाथा पर आधारित नाटक ‘समुद्र मंथन’ का मंचन किया जाएगा। प्रसिद्ध रंगकर्मी और एनएसडी के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी के निर्देशन में तैयार यह प्रस्तुति सायं 7 बजे जवाहर कला केंद्र के मध्यवर्ती सभागार में होगी। प्रवेश पहले आओ–पहले पाओ के आधार पर रहेगा।
राजस्थान दिवस के अवसर पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में इस बार रंगमंच की एक प्रभावशाली प्रस्तुति दर्शकों को देखने को मिलेगी। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा प्रस्तुत नाटक ‘समुद्र मंथन’ भारतीय पौराणिक साहित्य की एक महत्वपूर्ण कथा को समकालीन सामाजिक सरोकारों के साथ मंच पर जीवंत करता है। इस नाटक का लेखन आसिफ अली हैदर ने किया है।
विष्णु पुराण में वर्णित ‘समुद्र मंथन’ की कथा भारतीय सांस्कृतिक और रंगमंचीय परंपरा में विशेष स्थान रखती है। भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में इसे प्रारंभिक नाट्य प्रयोगों में माना गया है, जिसे रूपकों की ‘समवकार’ श्रेणी में रखा गया है।
नाटक की कथा उस समय से आरंभ होती है जब ऋषि दुर्वासा के शाप से देवराज इंद्र और देवता शक्तिहीन हो जाते हैं। इसका लाभ उठाकर असुरों के राजा बलि स्वर्ग पर अधिकार कर लेते हैं और दैत्य प्रवृत्तियाँ सृष्टि पर हावी होने लगती हैं। सृष्टि के संतुलन को बचाने के लिए देवता भगवान विष्णु की शरण लेते हैं। विष्णु के निर्देश पर देवता और दैत्य मिलकर क्षीर सागर का मंथन करते हैं, जिससे अमृत के साथ अनेक दिव्य और विनाशकारी तत्व प्रकट होते हैं।
नाटककार ने इस पौराणिक आख्यान को आधुनिक समाज की चुनौतियों से जोड़ते हुए एक विचारोत्तेजक प्रस्तुति तैयार की है। नाटक वर्तमान समय के सवालों से शुरू होकर पौराणिक कथा की यात्रा करता है और अंततः फिर आज के समाज के सामने आत्ममंथन का प्रश्न खड़ा करता है—क्या विकास की तेज़ रफ्तार में हम सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारियों को भूलते जा रहे हैं?
निर्देशक चित्तरंजन त्रिपाठी की सशक्त निर्देशन शैली इस प्रस्तुति को भव्यता प्रदान करती है। बड़े स्क्रीन पर दृश्य-प्रक्षेपण, सशक्त मंच-सज्जा, प्रकाश और संगीत की समन्वित योजना नाटक को गतिशील और प्रभावशाली बनाती है। कलाकारों का ऊर्जावान अभिनय कथा को दर्शकों के सामने जीवंत कर देता है और नाटक की ऊर्जा आरंभ से अंत तक बनी रहती है।
‘समुद्र मंथन’ केवल पौराणिक कथा का मंचन नहीं, बल्कि समकालीन समाज पर एक तीखा प्रश्न भी है। नाटक यह संदेश देता है कि जब समाज और सत्ता आत्ममंथन से दूर हो जाते हैं, तब संकट जन्म लेते हैं। समुद्र मंथन से निकले विष की तरह आज विकास की अंधी दौड़ से पैदा हो रहे प्रदूषण और पर्यावरणीय संकट भी मानवता के सामने गंभीर चुनौती बनकर खड़े हैं।
राजस्थान दिवस के अवसर पर आयोजित यह प्रस्तुति दर्शकों को भव्य दृश्यात्मकता, सशक्त अभिनय और विचारोत्तेजक कथानक के साथ एक यादगार रंगमंचीय अनुभव प्रदान करेगी।
राजस्थान दिवस: जेकेके में 17 मार्च को खेला जाएगा ‘समुद्र मंथन’
