-सनातन धर्म की परंपराओं को समर्पित एक प्रेरणादायक आयोजन
-रेवासा धाम के पं. दीपक सुरोलिया द्वारा मंत्रोच्चार के साथ दी गई दीक्षा
अहमदाबाद। भारतीय सनातन संस्कृति के मूल स्तंभों में से एक, संस्कार परंपरा, आज भी उसी श्रद्धा और भक्ति के साथ जीवित है- इसका एक सुंदर और प्रेरणादायक उदाहरण देखने को मिला अहमदाबाद में। अवसर था नवलगढ़ के ख्यातनाम समाजसेवी व भामाशाह श्री गोविंदराम बासोतिया जी के पौत्र अंशुल के यज्ञोपवित संस्कार का, जो वैदिक विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ सम्पन्न हुआ।
अंशुल, जिन्होंने हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) से अपनी उच्च शिक्षा पूर्ण की है, अब जीवन के उस महत्वपूर्ण पड़ाव पर हैं जहाँ एक बालक “द्विज” बनकर आध्यात्मिक, नैतिक और सामाजिक उत्तरदायित्वों की ओर पहला कदम बढ़ाता है। यह केवल एक धार्मिक कृत्य नहीं, बल्कि आत्मा को धर्म से जोड़ने वाला एक पवित्र संस्कार है।

यह आयोजन केवल एक पारिवारिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि सनातन संस्कृति की अमर चेतना का साक्षात दर्शन था। पूरे विधि-विधान का संचालन रेवासा धाम के प्रतिष्ठित विद्वान पं. दीपक जी सुरोलिया द्वारा किया गया, जिन्होंने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ अंशुल को मंत्र दीक्षा प्रदान की।
संस्कार- जो जीवन की दिशा तय करते हैं
हिंदू धर्म में यज्ञोपवित संस्कार को केवल एक रस्म नहीं, बल्कि जीवन में धर्म, ज्ञान और कर्तव्य की शुरुआत माना गया है। यह वह संस्कार है जो व्यक्ति को केवल सामाजिक नहीं, आध्यात्मिक उत्तरदायित्वों के लिए भी तैयार करता है।
परिवार की गरिमामयी उपस्थिति ने बढ़ाया आयोजन का गौरव
इस पावन अवसर पर बासोतिया परिवार की उपस्थिति ने इस कार्यक्रम को और भी स्मरणीय बना दिया।
उपस्थित गणमान्यजन थे:
डॉ. विजय बासोतिया, राजकुमार बासोतिया, संजय बासोतिया, पराग भाई साहब, काजल बहन जी, श्रीमती उमा बासोतिया, श्रीमती आशा बासोतिया, श्रीमती संगीता बासोतिया, काईवान जी, श्रीमती सोनिया जी, आदर्श बासोतिया, श्रीमती मानसी बासोतिया, श्री आशीष बासोतिया, श्रीमती अभिज्ञा बासोतिया, शौर्य जी एवं कु. अन्वीक्षा बासोतिया।
पूरे आयोजन में श्रद्धा, भक्ति, अनुशासन और उत्साह का अद्वितीय संगम देखने को मिला।
जहाँ संस्कृति है, वहीं भारत है
यह आयोजन पुनः यह सिद्ध करता है कि सनातन धर्म केवल एक धार्मिक व्यवस्था नहीं, बल्कि जीवन जीने की वह शाश्वत पद्धति है, जिसकी जड़ें परिवार, समाज और धर्म से जुड़ी होती हैं।
देश या विदेश, कहीं भी रहकर भी जो संस्कारों से जुड़ा है, वही सच्चा सनातनी है।
बासोतिया परिवार ने यह उदाहरण प्रस्तुत किया है कि आधुनिक जीवनशैली में भी हमारी प्राचीन परंपराएं अंधविश्वास नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का स्रोत हैं। जब तक ये संस्कार जीवित हैं, सनातन धर्म की आत्मा भी जीवित रहेगी।
