सुन ज़िन्दगी, कभी तो सुन,
रुक अरे! कुछ देर तो ठहर।
पता है मुझे, बड़ी जल्दी है तुझे
पर ए – दोस्त कभी तो आराम से गुज़र,
सुबह की चाय पर बैठ कुछ देर मेरे साथ,
तुम्हें चाय की चुस्कियों के साथ बताऊँगी
कि रात क्या सपना देखा मैंने, सुनाऊँगी…
आ कभी दोपहर में जब
मैं बैठी होती हूँ कुछ पल अकेली,
तो आ और कभी बन मेरी सहेली।
क्या सोच रही थी मैं तुझे बताऊँगी?
क्या चल रहा था मेरे अंदर, सुनाऊँगी?
फिर भी ना वक़्त मिले तो रात में आ
जब सुन रही होती हूँ मैं गाने,
आ कभी सुन मेरे साथ वो नग्मे
महसूस कर वो, जो मैं महसूस करती हूँ।
या… कभी आ उस पल तुझे दिखाऊंगी,
की रात की खामोशी में भी
कितना शोर होता है , सुनाऊँगी
यही तो वो लम्हे हैं जो मैं खुद के लिए जीती हूँ,
जिनमें खुश होकर तेरा शुक्रिया अदा करती हूँ…
अगर देखना चाहती है ,,की ज़िंदगी क्या है?
तो आ मेरे इन हसीन पलों में और
जी ले खुद को क़तरा-क़तरा,रफ़्ता-रफ़्ता…

-आशी, जयपुर
